मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

प्रेम से भय को जीत लो!

प्रेम से भय को जीत लो!
किसी भी रिश्ते में एक कोर आकांक्षा होती है जिसे संतुष्ट और सुरक्षित करने की आवश्यकता होती है। आप किसी भी रिश्ते को पूर्णतया संतुष्ट नहीं कर सकते। कोई भी ऐसा व्यक्ति जो अपने पूरे परिवार को खुश करने का प्रयास करता है, वह बिल्कुल अलग व्यक्ति बन जाता है। समझिए, भय हमेशा बंधनों में बांधता है, जबकि प्रेम हमेशा मुक्त करता है। जबतक कि समाज आपको भयभीत न कर दें, आप उसको सुनते नहीं हैं। इसीलिए समाज आपको सभी संभावित स्रोतों जैसे कि असुरक्षा, नियम, कानून, पूजा आदि से भयभीत करता रहता है।
भय रिश्तों में जलन का भी सृजन करता है। भय हमारे अधिकांश कार्यों एवं संवेगों का आधार है। जलन, क्रोध, लालच ये सभी संवेग भय से उत्पन्न होते हैं। और हमें इसकी जानकारी भी नहीं होती है। हम यह भी नहीं जानते हैं कि भय ही इन सभी का कारणात्मक घटक है। यही समस्या है। इसीलिए जहां तक हमारे व्यवहार प्रतिमानों का प्रश्न है, हम निरंतर अंधकार में ही रहते हैं। इसीलिए रिश्तों को निभाना मुश्किल हो जाता है।
समझ लीजिए कि कभी भी भय एवं प्रेम का सह-अस्तित्व संभव नहीं है। यदि रिश्तों में विशुद्ध प्रेम है, तो कभी भी भय नहीं हो सकता। यदि भय है, तो कभी भी प्रेम नहीं हो सकता। रिश्तों में कुछ निजी स्वार्थ होते हैं। रिश्तों में कुछ उद्देश्य, लक्ष्य, सुरक्षा आकांक्षा की आकांक्षा, भय या बदले में कुछ मिलना आदि होता है।
और इसी कारण से भय की उत्पत्ति होती है। हम प्रत्येक रिश्ते में सुरक्षा देखते हैं। आरामदाय जीवन जीने के लिए हमें हमेशा सुरक्षा चाहिए होती है। दरअसल यह एक प्रकार का कारावास है जिसे प्राप्त कर हमें आनंद प्राप्त होता है। लोग स्वतंत्रता की बात तो करते हैं, किन्तु मैं आपको बता दूं वे उतने ही डरे हुए होते हैं! उन्हें केवल कारावास ही पसंद होता है। कारावास की सहज सहनीय प्रभाव में, उन्हें ऐसा महसूस होता है, जैसे कि वे मुक्त हैं। आपको अपने अन्य सम्बन्धों में कभी भी असुरक्षित महसूस नहीं होगा क्योंकि वहां हमेशा ही लालच, भय एवं क्रोध की रस्साकसी होती है जोकि आपको रिश्तों के परिचित प्रतिमानों में सुव्यवस्थित रखती है। किन्तु गुरू के साथ, आप पूर्णतया मुक्त होते हैं और आप भयभीत हो जाते हैं।
गुरू कभी भी आपको वह सुरक्षा प्रदान नहीं करता जिसकी आप सदा तलाश में रहते हैं। वह कभी भी आपको वे प्रतिमान प्रदान नहीं करेगा जिसकी आपको तलाश है। जब आपको वह सुरक्षा नहीं मिलती है जिसकी आप तलाश में हैं, तो आप अपने भीतर गहन केन्द्र का विकास करते हैं। आप भयमुक्त होकर अपना विकास करते हैं क्योंकि आप जानते हैं कि खोने के लिए कुछ नहीं है। और जब आपको यह मालुम हो जाता है कि खोने के लिए कुछ नहीं है, तो फिर आपको कोई भय नहीं सताता है। आपको यह दिखाने के लिए कि खोने के लिए कुछ भी नहीं है, गुरू आप पर निरी असुक्षा थोप देता है। आपके प्रति गहन दयाभाव, आपके विकास के लिए उसकी गहन उत्कंठा के वाबजूद, वह आपको कोई भी सुरक्षा प्रदान नहीं करता है। जब आप मामूली सी भी सुरक्षा प्रदान नहीं करते हैं, तो आप ईश्वर को पा लेते हैं। मृत्यु के बिल्कुल नज़दीक पहुंचकर, ही आप यह जान पाते हैं कि खोने के लिए कुछ नहीं है और यह कि समस्त भय आधारहीन हैं। और गुरू अपने खुद के तरीकों से आपको यह समझाने की चेष्टा करता है।
इसीलिए गुरू से दूर भागने का प्रयास न करो। समझों कि वह यहां सिर्फ इसीलिए है क्योंकि वह आपको दिखाना चाहता है कि आप क्या हैं। अभय आपकी निहित प्रकृति है। वर्षों से आप भय में जकड़े हुए हैं। गुरू ही शर्त की इन पर्तों को, जिन्हें आपने अपने ऊपर थोप लिया है, को तोड़ने का प्रयास करता है। यदि आप उसे अपने ऊपर विश्वास और प्रेम के साथ काम करने का अवसर देते हैं, तो आप अपनी आंखों के सामने स्वयं को परिवर्तित होता देख पायेंगे।

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