मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

सफलता हेतु विचार और कार्य को एक कर दो

भारत के प्रबुद्ध गुरू, रामकृष्णन परमहंस कहते हैं, ‘मन मुख एक करो’ (अर्थात् अपने विचारों और वाणी को एक कर दो।)
आपके भीतर निरंतर चलने वाले शब्दों और ऐसे शब्द जिन्हें आप मुख से बाहर निकालते हैं, को संयुक्त करना ही ज्ञान है। अपनी भीतर चलने वाले शब्दों और उन शब्दों को जो आप मुख से बाहर आ जाते हैं, एक जुट करो। अपनी भीतरी अंतरिक्ष से पाखण्डता को दूर करो। भीतरी एकजुटता की ओर यह आपका पहला कदम होगा। ऐसे शरीर में रहना जहां भीतरी शब्द और बाहरी शब्द एक-दूसरे से जुड़ जाएं, तो वह शरीर स्वर्ग हो जाता है। कोई भी वस्तु आपको इतना आनंद प्रदान नहीं कर सकती जितना कि एक ऐसे शरीर में रहना जिसमें भीतरी एवं बाहरी शब्द एक हो जाएं।
जापानी वैज्ञानिक, डाॅ. मसरू इमोटू, जिन्होंने जल पर विचारों एवं शब्दों के प्रभावों का अध्ययन किया है, ने एक रोचक शोध किया है। परिणाम दर्शाते हैं कि जल भी हमारे शब्दों, विचारों एवं अनुभूतियों पर स्पष्टरूप से प्रतिक्रिया करता है। करीबन 70 प्रतिशत हमारा शरीर जल से बना है और धरती उपग्रह भी 70 प्रतिशत जल से ही ढकी हुई है। इसीलिए आप शब्दों की शक्ति की कल्पना कर सकते हैं!
कोई भी विचार जिससे आप खुद को भेद लेते हैं, और सभी अन्य आत्म-विरोधी विचारों को एकजुट कर लेते, तो यह अवस्था वास्तविकता बन जाती है। तब ऐसा विचार खुद ही प्रकट होता है।
आत्म-विरोधी विचार क्या होते हैं?
जब आप दो विकल्पों के मध्य निर्णय नहीं कर पाते हैं, कभी-कभी दोनों एक दूसरे के विरोधी होते हैं, तो आप आत्म-विरोधी विचारों में फंस जाते हैं। उदाहरण के लिए, आप धन चाहते हैं, किन्तु आप यह सुनिश्चित नहीं कर पाते हैं कि क्या आप धनी बनने के पीछे की जिम्मेवारी को संभाल सकते हैं। तो फिर आप इस विचार को टालना शुरू कर देते हैं, प्रतीक्षा करते हैं, और कोई भी निर्णय नहीं ले पाते हैं।
आप नहीं जानते हैं कि आपने खुद को कितना अपंग बना लिया है! आपके पास अपार आवश्यक ऊर्जा का भण्डार है, बस आपको इसे दिशा देने की आवश्यकता है। आपको अपनी इच्छाओं को एकीकृत करने की आवश्यकता है, और वे खुद ही पूरी हो जाएंगी। जो कुछ आप सोचते हैं, वहीं आपके जीवन की वास्तविकता बन जाती है।
यदि आप चाहते हैं कि आपके पास धन हो, तो अवश्य ही आपके पास धन होगा। यदि आप चाहते हैं कि आपके पास स्वास्थ्य हो, तो आपके पास स्वास्थ्य होगा। यदि आप चाहते हैं, कि मेरे अच्छे रिश्ते बनें, तो अवश्य ही आप अपने आस-पास मौजूद लोगों के साथ मधुर रिश्ते बनाने में सफल हो जाते हैं। यदि आप चाहते हैं कि आपको ज्ञान प्राप्त हो जाए, तो आप निश्चय ही ज्ञान को अभिव्यक्त करेंगे।
जोकुछ भी विचार आप सोचते हैं, वह विचार स्वतः ही आपके जीवन में प्रकट हो जाता है। स्वतः ही उस लक्ष्य हेतु आप अपना मार्ग, विधियां एवं रास्ते तलाश लेते हैं। यह स्वतः ही आपसे उजागर हो जाता है। जिस लक्ष्य के लिए आप निरंतर प्रयास करते हैं, वह निश्चय ही आपके लिए मार्ग बना देता है। जो कुछ भी आप संजोते हैं, अपने आत्म-विरोधी विचारों को एकजुट करते हैं, वही वास्तविकता बन जाती है।
यह कुण्डलिनी शक्ति को जागृत करना है जोकि आपके भीतरी और बाहरी संसार में परिपूर्णता लाती है।
एक खोजी की सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि वह जानता है कि यह उचित है किन्तु फिर भी वह संघर्षमय रहता है।
यदि आपको आलस्य घेर लेता है, तो न तो आपको यह प्राप्त होगा और न ही वह। और हमेशा ही एक ही विचार से चिपके रहेंगे! इसे हम कारण परत (कारण शरीर) कहते हैं - अर्थात् अतीत की आदतों की भूलभूलैया में फंसे रहना। यह वह अंतरिक्ष है जहां आप जीवन पर्यंत अथवा कई जीवनों तक फंसे रह सकते हैं। इस परत से बाहर आने के लिए, आपको एक सशक्त समाधान की आवश्यकता होती है। आपको एक सशक्त कदम उठाने की आवश्यकता है और अपने कदमों को दृढ़ता से आगे बढ़ाने की। अपनी इच्छाओं को एकीकृत कीजिए और उस इच्छा को पूरा करने के लिए हर संभव प्रयास कीजिए। विरोधाभासों और संघर्षों से स्वयं को मुक्त कीजिए - जिस मैं ‘ज्ञान में रहना’ कहता हूं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें