मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

केवल कर्तव्य पूरा करने के लिए ही कार्य न करें!

केवल कर्तव्य पूरा करने के लिए ही कार्य न करें!
एक बार एक व्यक्ति बुद्ध के पास आया, वह संयास चाहता था। वह बुद्ध का शिष्य बनना चाहता था।
बुद्ध मुस्कुराए और उससेे कहा, ठीक है, मैं तुम्हें स्वीकार करूंगा। किन्तु मेरी एक शर्त है। पहले तुम जाओ और अपने परिवार की और अपने मित्रों की हत्या कर दो, और फिर मेरे पास लौटकर आओ।
वह व्यक्ति बहुत आश्चर्यचकित हुआ। बुद्ध के कहने का क्या आशय है? क्या बुद्ध मुझसे अपने परिवार और मित्रों की शारीरिकरूप से हत्या करने को कह रहे हैं?
नहीं! उनके कहने आशय था कि जाओ और समाज की उस आवाज की हत्या करो जोकि तुम्हारे भीतर है। यह आवाज निरंतररूप से तुम्हें निर्देश देती रहती है, तुम्हें परेशान करती रहती है। उन्हें मनोवैज्ञानिक तरीके से मार दो, न की असल में। अपने अस्तित्व से उनके प्रभाव को नष्ट कर दो।
अपने जीवन को नज़दीक से देखिए। आपके सिर के ऊपर कितने लोग बैठे हुए हैं, और आपको निर्देश दे रहे हैं कि कैसे जिएं और क्या करें? कितने ही लोग आपको बता रहे हैं कि आपके लिए क्या सही है और क्या गलत है। आपके जीवन को नियंत्रित करने वाले ये लोग कौन हैं? आपके माता-पिता, आपके बच्चे, आपका पति, आपकी पत्नी, आपके मित्र, अजनबी, समाज, कानून। उन समस्त नैतिक पुस्तकों के लेखक, जिनका आपने अध्ययन किया है, उन समस्त प्रवचनों के वक्ता, जिन्हें आपने सुना है, आपके सिर पर सवार हैं!
ऐसे अनेक लोग मिल जायेंगे जो आपको बतायेंगे कि क्या त्याग करें, और किसके लिएः अपने परिवार के लिए, अपने बच्चों के लिए, समाज के लिए, अपनी मातृभूमि के लिए, किसी विचारधारा के लिए, ईश्वर के लिए...! प्रत्येक देशभक्त यह सोचता है कि हत्या करना ही उसका कर्तव्य है! यहां तक कि हिटलर ने भी यहूदियों का इस धरती उपग्रह से नामोनिशान मिटाना अपना परम कर्तव्य मान लिया था। आप खुद को मार रहे हैं!
अपने अंतकरणः से यह प्रश्न पूछिएः अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए मेरे क्या कारण हैं? क्या किसी को प्रसन्न करने के लिए? अस्वीकृति के भय के कारण? अपराधबोध के कारण? नैतिकरूप से श्रेष्ठ बनने के गर्व के कारण? उन समस्त कार्यों की एक सूची बनाइए जिन्हें आप पिछले पांच वर्षों से कर रहे हैं। और जो कार्य आप अभी कर रहे हैं, उस पर निशान लगाइए। खुद से पूछिएः क्या इसका कोई मूल्य है? क्या इन कार्यों को करने से आपको अधिक ईष्या की अनुभूति हुई है, क्या आपको अधिक पूरिपूर्णता का एहसास हुआ है? या फिर इन समस्त कार्यों ने आपको रोष की अस्पष्ट अनुभूति के बीच छोड़ दिया है?
अब, ऐसा कीजिए कि कुछ ऐसे कार्यों की सूची बनाइए जिन्हें आपने दूसरों के लिए किया है और इन कार्यों को करके आपको परम आनंद प्राप्त हुआ है। तो यह कौन सा समय था जब आपने दूसरों के लिए कार्य किए थे। वे कौन लोग थे जिनके लिए आपने कार्य किए थे? आप जान पायेंगे कि यह वह समय था जब आपने निस्वार्थ होकर कोई कार्य किया था, यह एक ऐसा समय था जब आपने स्वैच्छा से अपने ध्यान को खुद से हटाकर दूसरों पर केन्द्रित कर दिया था। यह व्यक्ति कोई भी हो सकता है - आपका प्रेमी, प्रेमिका, आपका पति/पत्नी, आपके बच्चे या फिर कोई दोस्त।
देखिए, जबकभी प्रेममय होकर कार्य किया जाता है, तो कभी भी रोष की अनुभूति नहीं होती है। कभी भी कर्तव्य का बोझ नहीं होता है। प्रेम वह कुंजी है जो आपको कर्तव्य के कारावास से मुक्त कर देती है! यह कोई नैतिक कथन नहीं है।
ण् आप विश्वास करें या न करें, आप यह स्वीकार करें या न करें, किन्तु यह सत्य है कि हम एक दूसरे से गहनतम जुड़े हुए हैं। जिस प्रकार धरती के पारिस्थितिक तंत्र में प्रत्येक अति सूक्ष्म जीव भौतिक वायुयान से परस्पर जुड़ा है, हम अपनी सजगता के बिना ही एक-दूसरे से गहन तौर पर जुड़े हैं। यही हमारे अस्तित्व की वास्तविकता है। इसकी पहचान करना परिपक्वता की निशानी है।
जब आप दूसरों के लिए प्रेम का अनुभव करते हैं, तो आप स्वाभाविक रूप से सजगता में छलांग लगा देते है!

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