क्या आप जानते हैं कि आनंद कैसे मनाएं?
आखिरी बार कब आपने खुद के साथ समय बिता कर आंनंद मनाया?
अक्सर, हम अपने साथ होकर कभी भी सहज नहीं रहते हैं। हम हमेशा लोगों के साथ, शोरगुल में रहना पसंद करते हैं। हम अपनी पहचान दूसरों के साथ रहकर करते हैं, न कि अपने साथ रहकर। यदि आप अपने साथ होते हैं, तो हमें अकेलापन और भय सताता है। अपनी मां के गर्भ में आप अकेले ही थे, और यही आपका वास्तविक स्वभाव है। किन्तु उसके बाद क्या हुआ? आपने यह सोचना आरम्भ कर दिया कि आपको खुश रहने के लिए लोगों की जरूरत है। आप लोगों के साथ हंसते हैं, रोते हैं, उनसे बात करते हैं, और उन्हीं की वजह से पीडि़त होते हैं, और क्या-क्या नहीं करते। आप जानते ही नहीं हैं कि अपने साथ रहकर कैसे आनंद मनाएं।
जिस पल आप खुद को अकेला महसूस करते हैं, आप अपने भीतर हाथ-पांव मारना शुरू कर देते हैं। आपको भीतरी चकचक और चिंताए घेर लेती हैं, और आप यह विचार करना शुरू कर देते हैं कि शोर कैसे उत्पन्न करें- किसको आवाज दें, किससे बात करें या अपने कम्प्युटर पर किसके साथ चैट करें। आप अपने भीतर झांककर भयभीत होते हैं, इसीलिए आप बाहर देखते हैं। आप ध्यान करना शुरू कर देते हैं, धीरे-धीरे आप समझ जाते हैं कि आपको खुद को खुश रखने के लिए रिश्तों पर निर्भर होने की आवश्यकता नहीं है। आप खुद के लिए पर्याप्त हैं। जब आप खुद के साथ शांति महसूस नहीं करते हैं, तो आप अपने अस्तित्व की परीधि जिसे इस तरह के रिश्तों में जकड़ा हुआ कहते हैं में ही रहते हैं।
सर्वप्रथम आपको अपने साथ रिश्ते बनाने की आवश्यकता है। जब यह सशक्त और दृढ़ हो जाते हैं, तो दूसरों के साथ जुड़ना सिर्फ आनुषंगिक बन जाता है। ठीक अभी परिधि में जो होने की आवश्यकता है, उसे कोर में देखा जाता है और जिसे कोर में होना चाहिए उसे परिधि के रूप में जाना जाता है। आपको स्थिति को उल्टा करना है जिससे आप अपनी भीतरी टकटकी को घुमा सकें। खुद के साथ रिश्ते बनाने के लिए, आपको अपने मस्तिष्क के पीछे जाने के लिए साहस की आवश्यकता है। आप हर किसी को आमंत्रित करते हैं सिवाय खुद के। आप दूसरों को आमंत्रित करते हैं क्योंकि इससे अहम की पूर्ति होती है। आप खुद को आमंत्रित नहीं करते हैं क्योंकि आपको भय रहता है कि सत्य का सृजन हो सकता है और0 आप इसे स्वीकार करने में समर्थ न होंगे! आप गलत स्थलों पर परमानंद को तलाशते हैं और शिकायत करते हैं कि यह आप से बचकर निकल गया है। यदि आप वास्तव में परमानंद को प्राप्त करना चाहते हैं, तो खुद के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताना शुरू करें। जब कभी संभव हो भीतर जाएं। जितना आप अपने साथ समय व्यतीत करेंगे, उतना ही अधिक आपको परमानंद का अनुभव होगा। जब आप खुद के साथ रहना सीख जायेंगे, तो आप अस्तित्व के साथ बातचीत कर सकेंगे।
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